चंडीगढ़ (Rudra Rajesh Kundu)संघर्ष की प्रतिमूर्ति किसान कमरे को न्याय दिलाने के लिए हर पल तत्पर रहने वाले कॉमरेड कृष्ण स्वरूप सिंह गोरखपुरिया ने आज हिसार के एक निजी हॉस्पिटल में अंतिम सांस ली।

कॉमरेड कृष्ण स्वरूप गोरखपुरिया का जीवन संघर्ष से भरा रहा और प्रदेश में अनेक ऐसे मौके आए जब वह विचारधारा की लड़ाई लड़ते हुए अपनों के भी खिलाफ खड़े रहे।1970 का एक वाकया बताया जाता है जब उनके अपने पैतृक गांव गोरखपुर में जाट समाज के लोगों ने वाल्मीकि समाज का बहिष्कार कर दिया था,तो स्वयं जाट कृष्ण स्वरूप गोरखपुरिया ने ऐसा करने से मना कर दिया। बताते हैं कि वे इसके बाद वाल्मीकि परिवारों से घुलने मिलने लगे और उन्हें अपने ही खेतों में जानवर चराने और उनके लिए चारा लेने की अनुमति दी। इस घटना के मात्र एक साल बाद 1978 में इसी गांव के वाल्मीकि और जाट समाज के लोगों ने उन्हें गोरखपुर गांव का सरपंच चुन लिया था।

कॉमरेड कृष्ण स्वरूप आर्यसमाज समाज के नेता मास्टर मादुराम से प्रभावित होकर अंधविश्वास और मूर्ति पूजा जैसी प्रथाओं के विरोध में खड़े हो गए थे। उन्होंने ताउम्र स्कूली बच्चों, कॉलेज के छात्र और छात्राओं, कर्मचारी संघ, किसान समूह और स्थानीय खाप पंचायतों को अपने ज्ञान और क्रांतिकारी विचारों से प्रेरित और शिक्षित करने का काम किया। आलम यह होता था कि सभी तरीके के लोग उनकी क्रांतिकारी बातों को ध्यान से सुनते थे और उनके पास आजादी के बाद के इतिहास की कहानियों का तो जैसे पूरा खजाना था।

1970 के दशक में स्नातकोत्तर के दौरान उन्होंने छात्र राजनीति में कदम रखा और 1973 में हिसार के स्थानीय जाट कॉलेज से उनका नाम इसलिए काट दिया गया था क्योंकि उन्होंने अध्यापकों की राज्यव्यापी हड़ताल का समर्थन करने का फैसला किया था।

छात्र राजनीति के अनुभव उन्हें वामपंथी विचारधारा की तरफ ले गए और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्ड होल्डर बन गए। लेकिन वैचारिक मतभेदों के चलते 2008 के बाद उन्होंने खुद को इस राजनीति से अलग कर लिया लेकिन वह अपने क्षेत्र में इतने विख्यात हुए कि आज भी उनके नाम को कॉमरेड कृष्ण स्वरूप गोरखपुरिया के नाम से जाना जाता है।

कॉमरेड कृष्ण स्वरूप के विचारों में खुलेपन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके 4 में से 2 बच्चों ने अंतरजातीय विवाह किया है उनके एक बेटे सुखबीर सिवाच जो इंडियन एक्सप्रेस समाचार समूह में असिस्टेंट एडिटर है और बेटी सुनीता सिवाच दोनों ने ही इंटर कास्ट मैरिज की है।

अपना पूरा जीवन धरने, प्रदर्शन में बिताने के बाद आज कॉमरेड किशन स्वरूप गोरखपुरिया ब्रह्मलीन हो गए लेकिन उनके विचार हमेशा देश और प्रदेश के आमजन में जीवित रहेंगे।

 

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